अध्यात्म

इस मंदिर में गढ़ा हुआ है शिवजी का त्रिशूल, दर्शन मात्र से ही भक्तों के सारे कष्ट हो जाते हैं दूर

भगवान शिव जी के प्रति लोगों के मन में श्रद्धा कूट-कूट कर भरी है, शिव जी के भक्त इनकी पूजा-अर्चना करके अपने जीवन के समस्त दुखों से छुटकारा प्राप्त करने की प्रार्थना करते हैं, ऐसा बताया जाता है कि जिस व्यक्ति के ऊपर भगवान शिव जी की कृपा दृष्टि बनी रहे तो उस व्यक्ति के जीवन की सभी परेशानियां पल भर में दूर हो जाती है, ऐसे बहुत से भगवान शिव जी के पवित्र मंदिर हैं जिनमें लोग वर्षभर दर्शन करने के लिए जाते हैं, इन मंदिरों के अंदर लोगों की भारी भीड़ लगी रहती है, इन्हीं मंदिरों में से एक भगवान शिव जी का एक प्राचीन मंदिर उत्तराखंड के चमोली जिले गोपेश्वर में स्थित है, जिसको गोपीनाथ मंदिर के नाम से जाना जाता है, यह मंदिर गोपेश्वर शहर के एक भाग में मौजूद है, भगवान शिव जी के इस प्राचीन मंदिर के अंदर एक अद्भुत गुबंद और 24 दरवाजे है, ऐसा बताया जाता है कि शिव जी के इस पवित्र स्थल के दर्शन मात्र से ही भक्तों के समस्त कष्ट दूर हो जाते हैं, जो भक्त इनके दर्शन करता है वह अपने आपको बहुत ही धन्य मानता है, भगवान शिव जी का गोपीनाथ मंदिर केदारनाथ मंदिर के बाद सबसे प्राचीन मंदिरों में से एक है।

भगवान शिव जी का यह मंदिर कितना पौराणिक है इसका अंदाजा इस मंदिर पर मिले अलग-अलग प्रकार के पुरातत्व और शिलायें दर्शाती है, इस मंदिर के चारों तरफ टूटी हुई मूर्तियां नजर आती हैं और यहां पर अवशेष भी मौजूद है, इस मंदिर के परिसर में एक त्रिशूल स्थित है जिसकी ऊंचाई लगभग 5 मीटर है, यह त्रिशूल आठ अलग-अलग धातुओं से निर्मित है, अगर हम पौराणिक मान्यता अनुसार देखें तो इस मंदिर में जो त्रिशूल है यह शिवजी का त्रिशूल है इस बात का तय पहले ही हो गया था, परंतु इस स्थान पर यह त्रिशूल कैसे स्थापित हुआ इस विषय में आपको जानकारी देने जा रहे हैं दरअसल, पुराणों में इस बात का जिक्र किया गया है कि गोपीनाथ मंदिर में भगवान शिव जी ने कई वर्षों तक तपस्या की थी।

ऐसा बताया जाता है कि जब देवी सती ने अपने शरीर का त्याग किया था तब उस समय के दौरान भगवान शिवजी तपस्या में लीन थे, उस दौरान ताड़कासुर नामक राक्षस ने तीनों लोकों में हड़कंप मचा रखा था और इस राक्षस को कोई भी पराजित नहीं कर पा रहा था, तब सभी देवता ब्रह्मा जी के पास गए तब ब्रह्माजी ने देवताओं को बताया था कि भगवान शिव जी का पुत्र ही ताड़कासुर को हरा सकता है, उसके पश्चात सभी देवताओं ने भगवान शिव जी की आराधना आरंभ कर दी थी लेकिन भगवान शिव की तपस्या में लीन बैठे हुए थे, भगवान शिवजी की तपस्या समाप्त करने के लिए इंद्रदेव ने यह कार्य कामदेव को सौंप दिया था ताकि शिवजी की तपस्या शीघ्र पूरी हो सके और उनका विवाह पार्वती जी से हो जाए जिससे शिव जी का पुत्र इस राक्षस का वध कर पाए, इंद्रदेव के कहने पर कामदेव ने अपने काम तीरों से शिवजी पर प्रहार किया था तब भगवान शिव जी की तपस्या भंग हो गई थी, तब शिव जी बहुत ही गुस्से में आ गए थे और उन्होंने कामदेव को मारने के लिए अपने त्रिशूल को फेंक दिया था तब यह त्रिशूल इसी स्थान पर गढ़ गया था जिस स्थान को आजकल के समय में गोपीनाथ मंदिर के नाम से जाना जाता है।

अगर हम भगवान शिव जी के इस त्रिशूल की बात करें तो आजकल के समय में एक आश्चर्यजनक बात देखने को मिलती है, ऐसा माना जाता है कि कोई भी व्यक्ति अपनी शारीरिक शक्ति से इस त्रिशूल को नहीं हिला पाता है, अगर कोई भगवान शिव जी का सच्चा भक्त है तो वह अपनी उंगली से इस त्रिशूल को छू लेता है तो इस त्रिशूल में कंपन उत्पन्न होने लगती है, इस मंदिर में भारी संख्या में श्रद्धालु भगवान के दर्शन के लिए दूर-दूर से आते हैं, इस मंदिर में शिवलिंग के साथ-साथ परशुराम और भैरव की प्रतिमा भी मौजूद है।

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