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हिंदी दिवस :100 साल बाद भी पूरा नहीं हो पाया गांधी जी का सपना, वाजपेयी ने बताई थी इसकी वजह

आज 14 सितम्बर को पूरी दुनिया में हिंदी दिवस मानाया जाता है। आज हिंदी भाषा जिस तेज़ी से विकास कर रही है, उसके लिए पिछले समय में इसके लिए किए गए काम ही हैं। आज़ादी की लड़ाई में भी हिंदी ने अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। हिंदी आज वैश्विक भाषा बन गयी है। पूरी दुनिया की 10 सबसे लोकप्रिय भाषाओं की बात आती है तो हिंदी में उन्ही में से एक है। इतना सब होने के बाद भी आज तक संयुक्त राष्ट्र में हिंदी हो अधिकारिक दर्जा नहीं मिल पाया है।

आज तक नहीं पूरा हुआ गांधी जी का सपना:

भारत अपनी तरफ़ से लगा हुआ है, लेकिन सफलता नहीं मिल पा रही है। आज भारत के कोने-कोने में हिंदी को बोलने और समझने वाले हैं। इसके साथ ही दुनिया में कई ऐसे देश हैं, जहाँ हिंदी प्रमुखता से बोली जाती है। कई ऐसे देश हैं जिनकी स्थापना हिंदी भाषियों ने ही की है। आज हिंदी दिवस के इस ख़ास मौक़े पर हम आपको गांधी जी के ऐसे सपने के बारे में बताने जा रहे हैं जो आज तक पूरा नहीं हो पाया। गांधी जी ने यह सपना आज से 100 साल पहले देखा था, जिसे आजतक पूरा नहीं किया जा सका।

बात 1918 की है यानी आज से लगभग 100 साल पहले की। 100 साल बीत गए लेकिन आजतक महात्मा गांधी के सपने को कोई सरकार पूरा नहीं कर पायी। आपको बता दें महात्मा गांधी ने अपने सपने का ख़ुलासा इंदौर में किया था। यहाँ महात्मा गांधी के हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के अपने सपने की घोषणा की थी। इसके बाद देश आज़ाद हुआ और बापू के सपने को भी 100 साल हो गए, लेकिन कोई भी सरकार उनके इस सपने को पूरा नहीं कर पाई। यह कहना हिंदी साहित्य समिति के अध्यक्ष हरेराम वाजपेयी का है।

संविधान लागू होते ही राष्ट्रभाषा हिंदी बन गयी राजभाषा:

वाजपेयी कहते हैं कि आज़ादी तक राष्ट्रभाषा कही जानें वाली हिंदी संविधान लागू होते ही राजभाषा बन गयी। इंदौर में बना हुआ महात्मा गांधी मार्ग एमजी रोड हो गया और रविंद्रनाथ टैगोर मार्ग बन गया आरएनटी मार्ग। हिंदी के प्रति लोगों का अनुराग हो रहा है। लेकिन इसे राष्ट्रभाषा बनाने की पहल नहीं हो पायी। हिंदी दिवस के मौक़े पर वाजपेयी ने कहा था, देश जब आज़ाद हुआ तो संविधान लिखते समय हिंदी सहित 14 भाषाओं को राजभाषा का दर्जा दिया गया। संविधान लागू होते ही राष्ट्रभाषा की जगह हिंदी राजभाषा बन गयी।

आपकी जानकारी के लिए बता दें जब संविधान में संशोधन करके हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की बात आइ तो दक्षिण भारत में विरोध की लहर उठी। हिंदी को राष्ट्रभाषा घोषित करना, उसे ख़ुद के ऊपर थोपना मान रहे थे। जबकि इसके पीछे वजह कुछ और नहीं बल्कि राजनीति थी। स्वतंत्रता से पहले हमारा देश एक था। लेकिन बाद में सत्ता में आए लोगों ने इसे बाँटना शुरू कर दिया। वाजपेयी ने कहा कि किसी भी देश की एक ही राष्ट्रभाषा होनी चाहिए और हमारे देश में वह हिंदी ही होनी चाहिए।

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